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दिल्ली में कराई जाएगी कृत्रिम बारिश, जानिए कितना आएगा खर्चा और क्या इससे कम हो पाएगा प्रदूषण

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दिल्ली: राजधानी में प्रदूषण रुकने का नाम नहीं ले रहा, सरकार अलग-अलग तरह के हजारों प्रयास कर चुकी है साथ ही कई पाबंदियां भी लगा चुकी है जैसे पटाखों पर प्रतिबंध लगाना आदि. लेकीन इतने प्रयासों के बावजूद भी दिल्ली देश का सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है.

अब दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने बताया कि सर्दियों के दौरान राजधानी में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए आर्टिफिशियल बारिश कराने की तैयारी चल रही है. इसमें क्लाउड सीडिंग तकनीक की मदद ली जाएगी.

क्लाउड सीडिंग होती क्या है?

क्लाउड सीडिंग एक तरह से मौसम में बदलाव करने की कोशिश है, इसमें आर्टिफिशियल तरीके से बारिश करवाई जाती है और ये बारिश कभी भी करवाई जा सकती है. यह तकनीक अक्सर सूखा प्रभावित इलाकों या एयर पोल्यूशन से निपटने के लिए इस्तेमाल होती है.

सबसे पहले कुछ छोटे एयरक्राफ्ट को तैयार किया जाता है इनमें साइड में सिल्वर आयोडाइज्ड (AgI), ड्राई आइस (कार्बन डाई ऑक्साइड का ठोस रूप) और पोटेशियम आयोडाइज्ड (KI) भरी जाती है. एयरक्राफ्ट जब बादलों से होकर गुजरते हैं तो इनमें केमिकल मिल जाते हैं जो हवा में भाप को आकर्षित कर तूफानी बादल बनाते हैं. और मात्र 15 से 20 मिनट में बारिश हो जाती है.

आर्टिफिशियल बारिश इतिहास

आर्टिफिशियल बारिश या क्लाउड सीडिंग कोई आजकल की तकनीक नहीं है बल्कि सबसे पहले 1946 में अमेरिका के साइंटिस्ट विनसेंट जे ने इसका प्रयोग किया था. जिसके बाद तोपों से लेकर ग्राउंड जनरेटर तक से क्लाउड सीडिंग करवाई गई. अमेरिका ने 1967 से 1972 के बीच वियतनाम युद्ध में इस टेक्नोलॉजी का बतौर हथियार इस्तेमाल किया था. ऑपरेशन पोपे चलाया गया जिससे वियतनामी सेना की सप्लाई चेन बिगड़ी और जमीन भी दलदल में बदल गई.

चीन ने भी इस तकनीक में महारत हासिल कर रखी है उसने इसका कई बार इस्तेमाल किया है. मसलन साल 2008 में बीजिंग ओलंपिक के दौरान जब आसमान में एक साथ 1000 से ज्यादा रॉकेट दागे गए थे. जिन शहरों में मैच होने थे वहां एक दिन पहले बारिश करवाई गई थी जिससे खेल के दिन बारिश रुकावट ना बने.

कितना आता है खर्चा

एक अनुमान के मुताबिक क्लाउड सीडिंग के जरिए एक फीट बारिश करवाने में करीब 1600 रुपये का खर्चा आता है, भारत सरकार ने आर्टिफिशियल बारिश पर रिसर्च करने के लिए 2018 में 45 करोड़ और 2019 में 100 करोड़ रुपये खर्च किए थे.

अब देखना यह है की राजधानी दिल्ली में कृत्रिम बारिश करवाई जाती है या नहीं, और अगर करवाई जाती है तो क्या इससे प्रदूषण की समस्या का समाधान हो भी पाएगा या नहीं, वो तो वक्त ही बताएगा.

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